क्या ऐसे सुधरेगी भारत की शिछा व्यवस्था, कौन है जिमेदार हम , आप या सरकार

सरकारी शिक्षा व्यवस्था और स्कूल चलो अभियान पर विशेष-
?सुप्रभात-सम्पादकीय?( राहुल यादव पत्रकार )
साथियों,
शिक्षा मनुष्य का एक ऐसा खूबसूरत गहना होती है जिससे मनुष्य की खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं। शिक्षा मनुष्य के उतनी जरूरी होती है जितना शरीर को सुसज्जित करने के लिये वस्त्रों की होती है।कहा भी गया है कि बिना पढ़े नर पशु कहावै जैसे तोता टोइंया”।बिना शिक्षा के मनुष्य का विवेक जागृत नही होता है और पशु के समान होता है।हर माता पिता का दायित्व बनता है कि वह अपने बच्चे चाहे लड़का हो चाहे लड़की हो उसे शिक्षा का अवसर प्रदान कराये।इसीलिए सरकार ने शिक्षा को मनुष्य के मूल अधिकार से जोड़ दिया है और शिक्षा का दीप घर घर पहुंचाने के लिए सरकारी स्कूल खोले गये हैं। आजादी से पहले कुछ सूर्यपुर हथौंधा जैसे राजा महराजा होते थे जिन्होंने अपने राज्य अथवा स्टेट में शिक्षा को अनिवार्य बना रखा था और जबरिया शिक्षा व्यवस्था लागू कर रखी थी।उस जमाने में जो अपने बच्चे को स्कूल नहीं भेजता था उसे दंडित किया जाता था।एक समय था कि नौकरी की इच्छा रखने वाले ही शिक्षा ग्रहण करने स्कूल पढ़ने जाते और जिन्हें घर पर रहकर खेती किसानी करना होता था वह स्कूल शिक्षा ग्रहण करने नही जाते थे। लोग यह जानते थे कि शिक्षा नौकरी के लिए ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र के जरूरी होती है।शिक्षा क्षेत्र में सरकार की पहल प्रचार प्रसार का परिणाम है कि हर गरीब अमीर अपने बच्चे को अपनी सामर्थ्य के मुताबिक अच्छी शिक्षा दिलाने का प्रयास करता है।सरकार भी शिक्षा का विस्तार करती जा रही है और गाँव गाँव प्राइमरी मिडिल और बालिका स्कूलों की स्थापना करोडों रूपये खर्च कर रही है। इतना ही नहीं सरकार शिक्षा के प्रति लोगों को आकर्षित करने के लिए गरीब परिवार के बच्चों को मुफ्त में खाना कपड़ा जूता मोजा और किताबें तक उपलब्ध करा रही है। यह सुविधा सरकार प्राइमरी एवं माध्यमिक विद्यालयों में प्रदान कर रही है और इंटर तक मुफ्त शिक्षा दी जाती है। सरकार की इतनी सुविधाओं के बावजूद हर साल सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के दाखिले के लिए स्कूल चलो अभियान के तहत जागरूकता रैली निकालनी पड़ती है और घर घर जाकर सम्पर्क करना पड़ता है।सरकारी क्षेत्र की शिक्षा भी आज के दौर में कुछ विद्यालयों में आसमान की बुलंदियों को छूने लगी है और तमाम सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय मार्डन माडल स्कूल बने हुये हैं।इन माडल विद्यालयों के लिए कोई सरकारी फंड नहीं दिया गया है बल्कि हमारे शिक्षा प्रेमी गुरुत्व भार निभाने वाले शिक्षकों के समर्पण परिश्रम एवं लगन से संभव हुआ है। यह कहते हुए दुख हो रहा है कि हम भले ही चाँद पर पहुंच गये हो और परमाणु बम बना लिया हो लेकिन आजतक शिक्षकों की पूर्ति मानक के अनुरूप नहीं हो सकी है।विद्यालय तो गाँव गाँव बन गये हो लेकिन कक्षावार और घंटावार शिक्षा देने के लिए शिक्षकों की व्यवस्था नही हो पायी है।सरकारी शिक्षा को बेहतर बनाने में प्रधानाचार्य उसके सहायक शिक्षकों के साथ सहायक शिक्षा अधिकारी के साथ बेसिक शिक्षा अधिकारी की भी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। अगर सभी एकमत होकर बेहतरी देने में जुट जाय तो सरकार विद्यालय प्राइवेट स्कूलों के बाप बन जाय और जागरूकता रैली व स्कूल चलो अभियान की जरूरत न पड़े।एक समय था जबकि एक बार किताब खरीद ली जाती थी तो पुश्त दरपुश्त चलती थी और लोग उसे संभालकर रखते थे ताकि खर्च का बोझ न पड़े। अब तो हर साल नयी किताबें आती हैं और पिछले वाली बेकार हो जाती हैं।जो शिक्षक गुरु का उत्तदायित्व निभाता है उस पर अन्य कार्यों का बोझ डालना शिक्षा को गर्त में ढकेलने जैसा है।शिक्षक को शिक्षा क्षेत्र के दायरे में ही रखना सरकारी शिक्षा के भविष्य के हित में होगा। जब शिक्षक दूसरे कार्यों में व्यस्त रहेगा तो वह बच्चों को शिक्षा कैसे देगा? इसी तरह अगर शिक्षक स्कूल नहीं आते हैं और घूसपात के सहारे सरकारी खजाने को खाली करते रहते हैं।पहले क्षेत्रीय या जनपदीय लोग ही शिक्षक होते थे लेकिन अब तो दूसरे सूदूर जिलों के लोग नियुक्त होने लगे हैं।शिक्षक के रूप में महिलाओं की भरमार है और दूसरे जिले की महिला शिक्षक जल्दी स्कूल यदाकदा ही आ पाती हैं।बच्चों को पढ़ाया नहीं बल्कि बकरियों की तरह इकठ्ठा बैठाये रहा जाता है और समय समाप्त होने पर छोड़ दिया जाता है। यही कुछ कारण है कि तमाम सुविधाओं के बावजूद सरकारी शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है। धन्यवाद।

A Big Vision News Network India

About A Big Vision News Network India

Leave a Reply

*